जालंधर। सरकारी जमीनों की अलॉटमेंट, बेशकीमती प्लॉटों की संदिग्ध रजिस्ट्रियां और करोड़ों रुपये के कथित लेनदेन से जुड़े जालंधर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के पुराने मामले एक बार फिर जांच एजेंसियों के संभावित रडार पर आ गए हैं। करीब 100 करोड़ रुपये के कथित घोटाले को लेकर ढाई साल पहले उठे सवाल अब फिर चर्चा में हैं। इसकी वजह पंजाब में भ्रष्टाचार के एक मौजूदा मामले में सीबीआई की कार्रवाई है, जिसके बाद सवाल उठ रहा है कि क्या जांच की आंच ट्रस्ट की उन पुरानी फाइलों तक भी पहुंचेगी, जिनमें सरकारी संपत्तियों को कथित तौर पर कौड़ियों के भाव अलॉट करने से लेकर संदिग्ध रजिस्ट्रियों और रिश्वतखोरी तक के आरोप लगे थे। हालांकि, फिलहाल पुराने ट्रस्ट मामले को मौजूदा सीबीआई जांच में औपचारिक रूप से शामिल किए जाने की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन दोनों मामलों के संभावित संपर्क बिंदुओं को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
सौ करोड़ के नुकसान का दावा, अलॉटमेंट पर उठे थे गंभीर सवाल…
करीब ढाई साल पहले तत्कालीन ट्रस्ट चेयरमैन जगतार सिंह संघेरा ने आरोप लगाया था कि पिछली चेयरमैनियों और अधिकारियों के कार्यकाल में ट्रस्ट की बेशकीमती संपत्तियों की कथित गलत अलॉटमेंट, कम कीमत पर प्लॉट देने और सरकारी संपत्तियों से जुड़े अनियमित लेनदेन के कारण करीब 100 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। संघेरा ने बैंक से बैंक हुए कथित लेनदेन में 50 हजार रुपये तक की रिश्वत के प्रमाण मिलने का दावा भी किया था। इन आरोपों के बाद 2016 से 2022 के बीच हुई कई अलॉटमेंट और रजिस्ट्रियों की जांच की गई। सितंबर 2024 में छह बेशकीमती संपत्तियों की कथित संदिग्ध अलॉटमेंट का मामला सामने आया। इनमें 500-500 वर्ग गज के तीन प्लॉट शामिल थे, जिनकी कीमत करीब 1.5 करोड़ रुपये प्रति प्लॉट बताई गई, जबकि आरोप था कि इन्हें महज 7 लाख से 22 लाख रुपये के बीच अलॉट कर दिया गया। इन मामलों ने ट्रस्ट की संपत्तियों के मूल्यांकन, अलॉटमेंट प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए।
पुरानी रजिस्ट्रियों से लेकर गायब फाइलों तक जांच के घेरे में आए मामले…
गलत रजिस्ट्रियों के आरोपों में ट्रस्ट के पूर्व कार्यकारी अधिकारी और कुछ कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई। गुरु अमरदास नगर के प्लॉट नंबर 460 और न्यू जवाहर नगर के मकान नंबर 462 से जुड़े मामलों में करीब 7-8 साल पुरानी रजिस्ट्रियों की पड़ताल की गई। सितंबर 2024 में ही तत्कालीन ट्रस्ट चेयरमैन ने सात और संदिग्ध सौदों का दावा किया था। आरोप था कि करोड़ों रुपये की रिश्वत के बदले कीमती प्लॉट बेहद कम कीमत पर दिए गए। इन मामलों में कुछ मूल फाइलें गायब होने की बात भी सामने आई थी। इसके बाद राजस्व विभाग से दस्तावेज जुटाकर फाइलें दोबारा तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई। अब सवाल यह है कि यदि मौजूदा जांच में संबंधित संपत्तियों, अधिकारियों, दस्तावेजों या वित्तीय लेनदेन की कोई कड़ी मिलती है तो क्या इन पुरानी फाइलों को फिर से खंगाला जाएगा?
94.97 एकड़ जमीन अधिग्रहण में भी उठा था भ्रष्टाचार का मामला…
ट्रस्ट से जुड़ा विवाद केवल प्लॉटों की अलॉटमेंट और रजिस्ट्रियों तक सीमित नहीं रहा। सूर्या एन्क्लेव एक्सटेंशन के लिए 94.97 एकड़ जमीन के अधिग्रहण में करीब 5 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का मामला भी सामने आया था। इस मामले में पंजाब विजिलेंस ब्यूरो ने सेवानिवृत्त पीसीएस अधिकारी इकबाल सिंह संधू को गिरफ्तार किया था। जमीन अधिग्रहण से जुड़े इस प्रकरण ने भी ट्रस्ट के कामकाज और सरकारी जमीन से जुड़े फैसलों की निगरानी पर सवाल खड़े किए थे। इस तरह अलग-अलग समय पर सामने आए मामलों में संपत्तियों की अलॉटमेंट, रजिस्ट्रियों और जमीन अधिग्रहण जैसे कई पहलू जांच के घेरे में आए।
सीबीआई की कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल ..जांच का दायरा कितना बढ़ेगा?
अब 2026 में राजबीर सिंह घुम्मन और उनके कथित सहयोगियों से जुड़े भ्रष्टाचार मामले में सीबीआई की कार्रवाई के बाद पुराने मामलों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश के बाद मौजूदा मामले में सीबीआई की जांच और अक्टूबर 2026 में विभिन्न ठिकानों पर हुई छापेमारी ने जांच के संभावित दायरे को लेकर चर्चा तेज कर दी है। असल सवाल यह है कि क्या जांच केवल मौजूदा आरोपों और 2023 से 2026 के बीच की कथित गतिविधियों तक सीमित रहेगी, या सरकारी जमीन, संपत्तियों की अलॉटमेंट, लाइसेंस, नीतिगत फैसलों और पहले सामने आए भ्रष्टाचार के मामलों से जुड़ी कड़ियों की भी पड़ताल होगी? यदि पुराने मामलों से संबंधित कोई ठोस दस्तावेजी या वित्तीय संबंध सामने आता है तो जालंधर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट की फाइलें जांच के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
ईडी की संभावित एंट्री का आधार क्या होगा?..
इस पूरे मामले में प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं। हालांकि, केवल भ्रष्टाचार के आरोप सामने आने से ईडी की जांच अपने आप शुरू नहीं हो जाती। इसके लिए धनशोधन से संबंधित कानूनी आधार और जरूरी तथ्यों का सामने आना अहम होगा। यदि कथित रिश्वत, संपत्तियों से मिले अनुचित लाभ या धन के लेनदेन की ऐसी कड़ियां मिलती हैं जो धनशोधन के कानून के दायरे में आती हों, तो ईडी की भूमिका का सवाल गंभीर हो सकता है। फिलहाल जालंधर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के पुराने कथित 100 करोड़ रुपये के मामले को मौजूदा सीबीआई जांच से जोड़ने या उसमें ईडी की औपचारिक जांच शुरू होने की स्पष्ट सार्वजनिक पुष्टि नहीं है।
पुरानी फाइलें खुलेंगी या मामला नए आरोपों तक सीमित रहेगा?…
फिलहाल तस्वीर स्पष्ट होने के लिए जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई का इंतजार करना होगा। लेकिन ट्रस्ट की पुरानी फाइलों में दर्ज आरोप इतने गंभीर रहे हैं कि मौजूदा भ्रष्टाचार जांच के बीच उनकी प्रासंगिकता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि जांच के दौरान पुराने अधिकारियों, संपत्तियों, अलॉटमेंट आदेशों, रजिस्ट्रियों या वित्तीय लेनदेन का कोई प्रमाणित संबंध सामने आता है तो पुराने मामलों की दोबारा पड़ताल की मांग मजबूत हो सकती है। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि सीबीआई जालंधर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के कथित 100 करोड़ रुपये के घोटाले तक पहुंच गई है या ईडी की एंट्री तय है। असली सवाल यही है कि जिन पुरानी फाइलों में करोड़ों रुपये की कथित अनियमितताओं के आरोप दर्ज हैं, क्या वे एक बार फिर जांच के केंद्र में आएंगी या यह मामला केवल संभावित कड़ियों की चर्चा तक सीमित रहेगा?

