जालंधर:शहर की राजनीति इन दिनों एक अजीब और चौंकाने वाले हालात से गुजर रही है। विधानसभा में जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक रमन अरोड़ा और शहर में “इलाका संभालने” वाले नितिन कोहली—इन दोनों के बीच खिंची अदृश्य लकीर ने आम आदमी को दोहरे चक्कर में फंसा दिया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि फाइल पर मोहर विधायक की, लेकिन काम तभी होगा जब कोहली की हामी मिले।
एक शहर, दो पावर सेंटर..
विधानसभा में विधायक रमन अरोड़ा शहर की आवाज़ बनकर सवाल उठाते हैं, योजनाओं का खाका खींचते हैं और कागज़ी मंज़ूरी देते हैं। मगर ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। नगर निगम, विकास कार्य, ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर छोटे-छोटे जनहित के काम—हर जगह एक ही चर्चा है:
“मोहर तो अरोड़ा साहब से लगवा लो, पर फाइल आगे बढ़ानी है तो नितिन कोहली से मिलना पड़ेगा।”
जनता का दर्द: चक्कर ही चक्कर
आम नागरिक के लिए यह सत्ता-संतुलन सिरदर्द बन चुका है। कोई सड़क बनवाने गया, कोई सीवरेज की शिकायत लेकर पहुँचा, तो किसी को बिजली-पानी का कनेक्शन चाहिए। पहले विधायक कार्यालय से सिफारिश, फिर कोहली के पास दौड़—और अगर तालमेल न बना, तो काम अटक गया।
एक बुज़ुर्ग नागरिक ने व्यंग्य में कहा,
“अब शहर में जीपीएस चाहिए—पहले विधायक के पास जाओ, फिर कोहली के पास मोड़ लो।”
सवालों के घेरे में व्यवस्था
राजनीतिक गलियारों में यह सवाल ज़ोर पकड़ रहा है कि क्या विधायक सिर्फ दस्तख़त करने तक सीमित रह गए हैं?
या फिर शहर की असली कमान कोहली के हाथ में है?
जब चुने हुए जनप्रतिनिधि और ज़मीनी सत्ता केंद्र अलग-अलग हों, तो जवाबदेही किसकी होगी—यही सबसे बड़ा सवाल है।
अंदरखाने की राजनीति
सूत्र बताते हैं कि दोनों खेमों के बीच खींचतान ने प्रशासन को भी असमंजस में डाल दिया है। अफसर समझ नहीं पा रहे कि आदेश किसका मानें—विधानसभा में गूंजने वाली आवाज़ या शहर में चलने वाला ‘इलाका सिस्टम’। नतीजा यह कि फाइलें घूमती रहती हैं, जनता इंतज़ार करती रहती है। इसका नुकसान आप को ही होने वाला है।

