राजनीति की आपाधापी, कानूनी उलझनों और सार्वजनिक दबाव के बीच जब इंसान भीतर से थक जाता है, तो अक्सर उसका रास्ता अध्यात्म की ओर मुड़ता है। कुछ ऐसा ही दृश्य उस समय देखने को मिला जब शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने राधा स्वामी सत्संग ब्यास के प्रमुख बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों से मुलाकात की।
बताया जा रहा है कि यह मुलाकात किसी राजनीतिक एजेंडे से नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और मार्गदर्शन की भावना से हुई। सत्संग परंपरा में विश्वास रखने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि ऐसे समय में संतों का सान्निध्य व्यक्ति को धैर्य, संतुलन और सकारात्मक सोच प्रदान करता है।
इसी मुलाकात के कुछ समय बाद बिक्रम मजीठिया को कानूनी प्रक्रिया के तहत जमानत मिलना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। समर्थक इसे ईश्वर की कृपा और सत्संग के प्रभाव से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं आध्यात्मिक दृष्टि से इसे “कर्म और विवेक के संतुलन” का परिणाम माना जा रहा है।
बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों हमेशा से यह संदेश देते आए हैं कि सत्ता, संघर्ष और सफलता सब क्षणिक हैं, लेकिन आत्मिक शांति ही मनुष्य का स्थायी सहारा है। मजीठिया की यह मुलाकात भी इसी सोच को रेखांकित करती है कि कठिन समय में राजनीति से पहले इंसान को अपने भीतर झांकने की ज़रूरत होती है।
इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या आधुनिक राजनीति में अध्यात्म केवल निजी सहारा है या फिर संकट के समय दिशा दिखाने वाला प्रकाशस्तंभ भी।

