नरेश भारद्वाज
जालंधर
राजनीति में सिद्धांतों की बात भले ही बड़े मंचों से की जाती हो, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर इससे उलट नज़र आती है। एक प्रमुख स्थानीय नेता का राजनीतिक सफ़र इसी दल-बदल की प्रवृत्ति को उजागर करता है। हरपाल मिंटू पहले कांग्रेस, फिर भाजपा, उसके बाद दोबारा कांग्रेस और अब आम आदमी पार्टी में शामिल होने की तैयारी—यह क्रम कई सवाल खड़े कर रहा है। हरपाल मिंटू की पत्नी परमजीत कौर कांग्रेसी पार्षद है। मिंटू पहले युवा कांग्रेस फिर कांग्रेस में रहे बाद में मनोरंजन कालिया के निकटतम नेता रहे। फिर दोबारा कांग्रेस में आ गए और अब में जाने की तैयारी है।
सूत्रों के अनुसार संबंधित नेता जल्द ही आम आदमी पार्टी में औपचारिक तौर पर शामिल हो सकते हैं। पार्टी बदलने की इस कड़ी को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज़ है। विरोधी दल इसे सिद्धांतहीन राजनीति करार दे रहे हैं, जबकि समर्थकों का तर्क है कि यह “जनहित में बेहतर मंच की तलाश” है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बार-बार दल बदलने से न सिर्फ़ नेता की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है, बल्कि मतदाताओं के भरोसे को भी ठेस पहुंचती है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह कदम किसी वैचारिक बदलाव का परिणाम है या फिर आगामी चुनावों को देखते हुए राजनीतिक सुविधा का फैसला।
अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि आम आदमी पार्टी इस संभावित शामिल होने को किस तरह पेश करती है और जनता इसे किस नज़र से देखती है। एक बार फिर स्पष्ट है कि मौजूदा राजनीति में दल नहीं, दल-बदल ही सबसे बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।

